उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में लगातार बारिश और नदियों में आये उफान के बाद भू-स्खलन की भेंट चढ़ गयी हज़ारों जिंदगियों में मुश्किल से सौ पचास को छोड़कर अधिकांश चारों धाम की यात्रा पर निकले तीर्थ यात्री थे | कुछ अकेले या साथियों के साथ, कुछ पूरे परिवार सहित | घरवालों से एक दिन पूर्व तक मोबाइल पर संपर्क हो रहा था | सबकुछ ठीक ठाक था | अचानक संपर्क भंग हुआ फिर यात्रियों के साथ मृत्यु से सीधे जूझने की जद्दोजहद और परिजनों के पास आशंकाओं की लगातार लम्बी होती रातें | टीवी चैनल भी अनुमान आधारित खबरें दिखा रहे थे क्योंकि उन दुर्गम स्थानों पर पहुँचना निहायत मुश्किल था | फिर जब बारिश और बाढ़ का कहर थमा तो तबाही का रोंगटे खड़े करने वाला मंज़र सामने था | चारों ओर लाशों के ढेर, ढहे हुए मकानों का मलबा | सही गिनती आज भी न तो प्रशासन के पास है न वहाँ के बचे हुए निवासियों के पास | इस भयानक तबाही में केवल केदारनाथ के शिव बचे हैं, बस मंदिर अपने नक़्शे पर कायम है | मगर चैनलों के कैमरों ने जो दृश्य दिखाये, उसमें मंदिर का बाहरी हिस्सा भी लाशों से पटा हुआ दिखाई पड़ा | बारिश का कहर थमते ही सेना ने युद्ध स्तर पर राहत और बचाव कार्य शुरू किया | केंद्र सरकार ने भी राज्य में अपने हरेक संभव साधनों की तैनाती की है | बकौल गृहमंत्री गौरीकुंड में फंसे हजारों लोगों को निकालने के लिए वायु सेना के हेलीकॉप्टरों को लगाया गया है तथा राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल के 540 जवानों के 14 दल उत्तराखंड में तैनात किए गए हैं | केद्रीय आंकड़ा बताता है कि उत्तराखंड में 62,790 लोग फंसे हुए हैं | इस स्तब्धकारी स्थिति पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि राज्य में हुई तबाही और मृतकों के बारे में सही आकलन अभी संभव नहीं है | उन्होंने केदारनाथ में बादल फटने की घटना को ‘हिमालयी सुनामी’ करार दिया | उत्तरकाशी से खबर आयी है कि वहाँ बिजली और पानी का भारी संकट है | वहाँ गंगोत्री धाम, हर्षिल,झाला,धराली,भटवाड़ी,गंगनानी, मनेरी, नेताला और यमुनोत्री मार्ग में जगह-जगह हज़ारों यात्री फंसे हैं | इन सड़कों को खोलने में कई दिनों का समय लग सकता है |
उत्तराखंड की यह तबाही मात्र प्राकृतिक प्रकोप नहीं है बल्कि इसके मूल में प्रकृति के साथ निर्बाध जारी मानवीय खिलवाड़ है | विकास के मौजूदा पैटर्न ने पहाड़ों के पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान पहुंचाया है | पेड़ों को काटकर ढलान पर मकान और होटलों के निर्माण ने वहाँ की प्रकृति के संतुलन को विनष्ट कर दिया है | वहाँ बड़ी संख्या में हो रहे बांधों के निर्माण के लिए नदी की धारा को कृत्रिम तरीके से बांधने के कारण भी पर्यावरण को भारी क्षति पहुंची है | इन सब कृत्यों का परिणाम सबके सामने है |
आज अन्य क्षेत्रों से वहाँ पहुंचे लाखों श्रद्धालुओं के साथ बड़ी संख्या में वहाँ के निवासी भी प्रकृति की इस विनाश लीला की भेंट चढ़ गए हैं | यह घटना एक भयानक भविष्य की ओर संकेत करती है | प्रकृति के साथ मानवीय खिलवाड़ यदि इसी प्रकार जारी रहा तो यह खंड प्रलय महा प्रलय में भी बदल सकता है |