Tuesday, April 2, 2013

बूढ़ी दादी का चेहरा



गाँव के खेतों की मेड़ों से भी 
घनी हैं –बूढ़ी दादी के चेहरे की झुर्रियां,
जिसमें साफ-साफ दीखते हैं –
महेसर चच्चा,दिनेश भइया और बाबू के
अलग-अलग बँटे खेत,
सहुआइन का कर्जा, महतो के घर चोरी का किस्सा,
रधिया के गौने की कहानी और
उन सबके सर से होकर गुजरता हुआ
पिछबाड़े की ज़मीन के लिए
अपना वह पुश्तैनी मुक़दमा,
जिसने लील लिये हैं कई बार
चाची के कान के बुँदे, माँ के गले का हार,
और दादी की हँसुली |
दादी की गहरी आँखों का पानी
चेहरे पर फैली दरारों को नहीं सींच पाता,
सुन्न हो गए कान नहीं सुनते
पीठ पीछे दिये गये बहुओं का ताना
लेकिन जब भी
छोटका मुनवां, लोर सना चेहरा
और पोंटे भरी नाक लिए
तोतली आवाज़ में ‘डाऽडी-डाऽडी’ चिल्लाता है,
कैसे सुन लेती है दादी ?
कितना पुचकारती है दादी |
दादी ठाकुर जी की झोली में
अनुभव के सच संजोती है,
दादी अबकी बदरीनाथ जायेगी
और तब मेड़ों से भी और घनी,
और घनी हो जायेंगी दादी के चेहरे की झुर्रियां |
दादी की आँखों का पानी एक सैलाब में बदलते हुए
गंगा और ब्रह्मपुत्र की गंध से भर जाएगा,
दादी के सुनहले बालों में तब चमकने लगेगा हिमालय |
लेकिन सच कहूँ तब दादी
इन सब में कहीं नहीं होगी
वह तो आकाश हो जाएगी
क्योंकि धरती का कोई भी धुआँ
आकाश से ऊपर नहीं जाता
मेड़ खेत काट सकती है
आकाश कहाँ काट पाती है ?
      --शेखर शंकर [ ‘प्रश्नवाचक होने से पहले’ संग्रह से ]


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1 comment:

  1. बेहद मर्मस्पर्शी रचना .
    बहुत कुछ यादों में डुबोने के लिए मजबूर करती रचना ..

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