Tuesday, February 12, 2013

आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत प्रतिमान

जयंती पर विशेष  

आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत प्रतिमान
महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री


आधुनिक हिंदी साहित्य के शिखर-पुरुष महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री [माघ शुक्ल द्वितीया 1916 -07 अप्रैल 2011] आचार्यत्व और कवित्व के सारस्वत स्वरूप थे | उत्तर छायावाद के अग्रणी कवि आचार्य प्रवर निरंतर सात दशकों तक साहित्य रचना में सक्रिय रहे | इस बीच हिंदी गीत-कविता ने विचार और शिल्प के अनेक परिवर्तनों को देखा | महाकवि ने गीत-कविता की हरेक बदलती भंगिमा को समयानुरूप अपनी रचनाशीलता में आत्मसात किया | अनेक अर्थच्छवियां उकेरतीं उनकी बहुविध रचनाएं इस तथ्य का जीवंत प्रमाण हैं |
                        हिंदी काव्य जगत में जब आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का आगमन हुआ, उस समय एक ओर छायावाद का अवसान हो रहा था दूसरी ओर नवकाव्य धारा में प्रगति के स्वर भी मुखर हो रहे थे | शास्त्री जी के व्यक्तित्व में प्राच्यविद्या के ज्ञान से मंडित प्रतिभा और पांडित्य का अपूर्व संवलन रहा है | हिंदी काव्य क्षेत्र में उनकी सारस्वत प्रतिभा ने निरंतर नयेपन को ही अपना लक्ष्य बनाया |
                      भारतीय संस्कृति का सबसे जीवंत स्वरूप अपनी सम्पूर्ण गरिमा के साथ महाकवि जयशंकर प्रसाद के पश्चात् शास्त्री जी में ही दृष्टिगत होता है | भारत की अजस्र सांस्कृतिक धारा के वे अन्यतम कवि थे | वे मात्र अपने वेदांत दर्शन के ज्ञान के कारण ही नहीं, अपितु अपनी व्यापक लोकदृष्टि के कारण भी विशिष्ट थे | उत्तर छायावाद के प्रमुख काव्यकार महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की रचनाओं में एक ओर कलात्मक समृद्धि मिलती है, तो दूसरी ओर समय के सत्य की यथार्थ अभिव्यक्ति की ईमानदारी भी | आचार्य शास्त्री की प्रथम काव्यकृति ‘काकली’ का प्रकाशन 1935 में हुआ | शास्त्री जी को छायावादी कवियों का रचना-शिल्प अपनी ओर खींच रहा था | संस्कृत-साहित्य के अगाध ज्ञान के साथ जब हिंदी काव्य के आकर्षण का संयोग हुआ, तो काव्य-रचना की विलक्षण और वेगवती धारा फूट पड़ी, जो लगातार परवान चढ़ती रही | विभिन्न काव्यान्दोलनों के बीच भी उनकी रचनाशीलता निर्द्वंद्व और निर्वादी बनी रही |
                   प्रेम की मार्मिक अभिव्यंजना उनकी रचनाओं में भावानुभूति के चरम पर दृष्टिगत होती है –
                                                “नयन में प्राण में तुम हो,
                                                 गगन में गान में तुम हो,
                                                 न इतना भी रहा अंतर कि
                                                 मैं हूँ या तुम्हीं तुम हो |” 
शास्त्री जी के कुछ गीत आपनी प्रेमानुभूति के कारण रसज्ञ समाज के बीच सर्वाधिक लोकप्रिय हुए हैं, उनमें से एक है-
                                                 “किसने बांसुरी बजाई ?
                                                  जनम-जनम की पहचानी यह तान कहाँ से आई !
                                                  अंग-अंग फूले कदम्ब सम, सांस झकोरे झूले,
                                                  सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई |”  

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