Wednesday, January 30, 2013

राष्ट्र पिता को शत-शत नमन !
आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है | राष्ट्र पिता की पुण्य स्मृति को मेरा शत शत नमन !
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी मात्र एक व्यक्ति या महापुरुष नहीं थे | वे एक विचार और दर्शन थे | जीवन-जगत  में व्याप्त हिंसात्मक शक्तियों के विरुद्ध अहिंसात्मक क्रांति के अग्रदूत |
                                                आज ही के दिन गांधी एक जीवित कथा से इतिहास हो गए थे | काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे आज ही के दिन छीना था | उस क्षण का ह्रदय विदारक  चित्रण लुइ फिशर ने अपनी पुस्तक ‘गांधी की कहानी ‘ में किया है –“ शाम को साढे चार बजे आभा भोजन लेकर आई | यही उनका अंतिम भोजन होनेवाला था | इस भोजन में बकरी का दूध, उबली हुई कच्ची भाजियां,नारंगियाँ,ग्वारपाठे का रस मिला हुआ अदरक,नींबू और घी का काढ़ा –ये चीजें थीं | नई दिल्ली में बिड़ला भवन के पिछबाड़ेवाले भाग में ज़मीन पर बैठे हुए गांधी जी खाते जाते थे और स्वतंत्र भारत नयी सरकार के उप-प्रधान मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल से बातें करते जाते थे | सरदार पटेल की पुत्री और उनकी सचिव मणि बहन भी वहां मौजूद थीं | पटेल और प्रधान मंत्री नेहरु के बीच मतभेद की अफवाहें थीं| अन्य समस्याओं की तरह यह समस्या भी महात्मा जी के पल्ले डाल डी गयीं थीं |
                                                गांधी जी,सरदार पटेल और मणि बहन के पास अकेली बैठी आभा बीच में बोलने में सकुचा रही थी | परन्तु समय- पालन में गांधी जी का आग्रह वह जानती थी | इसलिए उसने महात्मा जी की घडी उठा ली और उन्हें दिखाई | गांधी जी बोले –“ अब मुझे जाना होगा |” यह कहते हुए वे उठे और फिर भवन के बाईं ओर बड़े पार्क में प्रार्थना स्थल की ओर चल पड़े| महात्मा जी के चचेरे भाई के पोते कनु गांधी की पत्नी आभा और दूसरे चचेरे भाई की पोती मनु उनके साथ चलीं | उनहोंने इनके कन्धों पर अपने बाजुओं का सहारा दिया | वह उन्हें अपनी ‘टहलने की छड़ियाँ’ कहा करते थे |
                                           प्रार्थना-स्थान के रास्ते में लाल पत्थर के खम्भों वाली लम्बी गैलरी थी| इसमें से होकर प्रतिदिन दो मिनट का रास्ता पार करते हुए गांधी जी सुस्ताते और मजाक करते थे ---------अब वह प्रार्थना-स्थान के पासवाली दूब पर चल रहे थे | नित्य की सायंकालीन प्रार्थना के लिए करीब पांच सौ की भीड़ जमा थी |----------- ठीक उसी समय तीन गोलियां चलीं | गांधी जी के मुंह से शब्द निकले ---  “हे राम !” और एक युग का पटाक्षेप हो गया |”
                                        महात्मा गांधी ने हमें सत्याग्रह का शस्त्र और अहिंसा का आचरण- शास्त्र दिया | आध्यात्मिक नैतिकता की सहायता से उन्होंने हमारी दुर्बलताओं को शक्ति और साहस में बदल दिया |उनका कहना था कि दुनिया में आज भी इतने लोग जिंदा हैं, इसीसे सिद्ध होता है कि संसार की नींव शस्त्रबल पर नहीं है, बल्कि सत्य,दया और आत्मबल पर है | 

Saturday, January 26, 2013

‘गणतंत्र’ का अर्थ



‘गणतंत्र’ का अर्थ

गणतंत्र दिवस के अवसर पर,भारत, भारतीयता के स्वाभिमान और सम्पूर्ण देश में व्याप्त एकता और अखंडता के प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष सूत्र को मेरा नमन और अपने सभी मित्रों को भारतीय गणतंत्र की 63 वीं वर्षगाँठ की हार्दिक शुभकामनाएँ !
                                       15 अगस्त 1947 को हमने आज़ादी का जश्न मनाया था और भारत राष्ट्र की आशाओं,उम्मीदों को मूर्त रूप देने देने के लिए 26 जनवरी 1950 को एक सर्वसम्मत संविधान लागू हुआ | आज जिसके उद्देश्य को एक बार फिर स्मरण और आत्मसात करने की आवश्यकता है –
 “हम भारत के लोग,भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व संपन्न,समाजवादी,पंथ निरपेक्ष,लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार, अभिव्यक्ति,विश्वास,धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिए तथा उन सबमे में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करनेवाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ-संकल्प लेकर इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं |”
                                        मित्रो,आज़ादी या स्वाधीनता निरंकुश भी बनाती है,जिससे अराजकता का जन्म होता है | हम बीते 63 वर्षों के प्रौढ़ गणतंत्र के नागरिक हैं | किन्तु ‘गण’ के साथ ‘तंत्र’ का समुचित सामंजस्य अब भी हमारा आकांक्षित लक्ष्य बना हुआ है | कभी कवि ‘धूमिल’ ने सवाल किया था –
                                    “ आज़ादी क्या तीन थके हुए रंगों का नाम है,
                                      जिन्हें एक पहिया ढोता है
                                      या कि इसका कोई खास मतलब होता है ?”
गणतंत्र आज़ादी के इस सही मतलब को पहचान देने की प्रक्रिया का नाम है, हम आज भी इस पहचान के लिए संघर्षरत हैं | आज 63 वर्षों में भी देश की बहुसंख्य जनता और विशेष रूप से देश की लगभग आधी आबादी कहा जानेवाला स्त्री-वर्ग असुरक्षा और आतंक के साये में जी रहा है | तो फिर इस गणतंत्र का  कोई अर्थ नहीं रह जाता | भारत की 60 प्रतिशत जनसंख्या 18 से 45 वर्ष के युवाओं की है ,जिसके बल पर भारत एक युवा राष्ट्र कहा जाता है | इस युवा शक्ति की अथाह ऊर्जा को सकारात्मक और सृजनधर्मी दिशा मिले तभी हमारा गणतंत्र सार्थक होगा |   


Wednesday, January 23, 2013

बातचीत



पाकिस्तान –हिंदुस्तान के बीच सैनिक कारवाई के बाद की स्थिति  आंकते हुए |

       बातचीत

चल रही है बातचीत
अनवरत,नितांत औपचारिक
जगी हैं रात भर अख़बारों की सुर्खियाँ
कि दो नोकदार सीखचों की बातचीत में
कितना लहूलुहान होती है हवा ?
वे हमेशा ठंढे माहौल में करना चाहते हैं बातचीत
ताकि कभी गर्म न हो पायें उनके शब्द |
हवा में उड़ती सैंकड़ों आलपिनें
एक दूसरे से पूछतीं हैं कि बिना उँगलियों में चुभे
समझौतों के किन कागजात में 
हमें नत्थी होना है |
वे हमेशा ऐसे ही होते हैं आमने – सामने
और ढूंढते रहते हैं बातचीत का रास्ता
उनकी रगों में हरदम दौड़ता रहता है गर्म बारूद |
सीमा पर जारी रहती है सैनिकों की आमदरफ्त
और चलती रहती है  बातचीत |   

Thursday, January 17, 2013

सिर्फ चिंता नहीं, चिंतन भी जरूरी



                     
                         सिर्फ चिंता नहीं, चिंतन भी जरूरी

    दिल्ली में मेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने अपने समय, समाज और संस्कृति के साथ उसमे बसी लगभग आधी आबादी के वजूद पर ही एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है | 16 दिसंबर 2012 चलती बस में घटी इस घटना के बाद  से जारी युवा आन्दोलन 22 दिसंबर को अपने उफान पर आ गया, जब आन्दोलनकारियों ने विजय चौक,नार्थ-साउथ ब्लॉक तथा रायसीना हिल्स पर एक तरह से कब्ज़ा ही कर लिया | सरकार सकते में आगई | आन्दोलनकारियों को पुलिस ने भरसक दबाने की कोशिश की,पानी की बौछारें और अश्रुगैस छोड़ी गयी, लाठियां चटकाई गयीं,मगर अपनी मांग पर डटे  युवाओं ने दूसरे दिन फिर पुरजोर प्रदर्शन किया | उनकी मांग थी- बलात्कारियों को कडी से कड़ी सजा और महिलाओं की सम्पूर्ण सुरक्षा की गारंटी |
      दुष्कर्म पीडिता के साथी और उस घटना में बुरी तरह घायल अवनींद्र पाण्डेय ने लम्बी चिकित्सा के बाद होश में आने पर जो बयान दिया, वह हमारे तथाकथित मौजूदा शहरी समाज की जिस अमानवीय और निर्मम तटस्थता की ओर संकेत करता है वह भी कम स्तब्धकारी नहीं | शायद भारत के इतिहास में यह एक ऐसी घटना है, जिसने समाज के हरेक वर्ग को झकझोर कर रख दिया है, यह सोचकर आत्मग्लानि होती है कि हम सभी दुर्भाग्य से उसी समय का हिस्सा हैं,जिसमे आदमी बर्बरता की सारी सीमाएं पार कर एक नृशंस जानवर में बदल चुका है |
      इस घटना के विरोध में देशभर के युवा आंदोलित हैं और संसद से सड़क तक एक बहस छिड़ चुकी है | इस बहस के केंद्र में भले ही दुष्कर्म की उक्त लोमहर्षक घटना हो किन्तु इसका विस्तार वर्तमान समाज में महिलाओं की अस्मिता और पितृसत्तात्मक पुरुषवादी समाज के उस दमनात्मक रवैये तक जाता है, जो रुढिग्रस्त भारतीय मानस में सदियों से जड़ जमाये बैठा है | बदलते सामाजिक परिवेश और  आज़ादी के साढ़े छह दशक बाद भी भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति पुरुष के दमनात्मक व्यवहार में कोई तब्दीली नहीं हुई यह तो स्पष्ट है | आज संसद के गलियारों से लेकर सड़क तक निर्बाध जारी इस बहस में राजनेताओं से लेकर बुद्धिजीवियों और आम आदमी तक और एक स्त्री- मजदूर से लेकर शिक्षिका तक अनायास ही जिस बहस का हिस्सा बन गए हैं, उसके दो पहलू स्पष्ट हैं – महिलाओं के प्रति पुरुषों के दमनकारी- प्रवृत्ति का विरोध दूसरे मौजूदा भारतीय समाज में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में महिलाओं के रहन-सहन में आया खुलापन |
      यह बहस बहुत दूर तक जा सकती है | मगर यह भी तय है कि 21 वीं सदी के प्रारंभिक दशकों में आज  महिलाओं के प्रति 16 वीं सदी का नजरिया हमारी कुंठा ग्रस्त मानसिकता का ही परिचय देगा | वैश्वीकरण के इस दौर में क्या ग्रहणीय है और क्या वर्जनीय यह  भी गंभीर चिंतन की अपेक्षा रखता है | 

Wednesday, January 2, 2013

नया साल : कुछ अनुभव प्रसंग



नया साल : कुछ अनुभव प्रसंग

    1.
हाथ का आंवला नहीं था
पारे की तरह था समय
मुट्ठी बंद करते ही
बिखर कर फिसल गया
कई छोटी-छोटी बूंदों में
जैसे आईना हाथ से
छूट कर बिखर गया हो कई किरचों में
सब में टूटा हुआ कई टुकड़ों में एक ही चेहरा
बेतरह दंश देती कुछ ऐसी स्मृतियों के साथ
जिन्हें सहेजने में उंगली छिल जाने
रक्त निकल आने का भय है |
    2.
कुछ न कुछ बदलेगा जरूर
क्यों कि बदल गया है मौसम
दीवारों पर टंग गए हैं
हरे-भरे दृश्यों वाले नये कैलेण्डर
कुछ और रंगीन हो गए हैं
डालियों पर धूप सेंकती तितलियों के पंख
तेज सर्द हवाओं से जड़ों तक
काँप रहे हैं पुराने पेड़ |
पेंशन की क़तार में थक कर बैठ गयी 
एक वृद्धा सोचती है -
मरते खपते ही सही
गुजर ही गया एक और साल
पुरानी हवेली के रोशनदान में
गौरैया ने बना लिया है एक नया घोंसला
और हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
    3.
जब शहर की तमाम घड़ियाँ
कभी तेज- सुस्त क़दमों से चलती हुई
इकट्ठी हो रहीं थीं
उस कोहरे की झील के इर्द-गिर्द
मैं सारी रात अपनी कविता में
उन प्रसूताओं की चीख सुन रहा था,
जिनके भ्रूण निष्पंद हो रहे थे
सर्द सड़कों पर |
ऐसे में कब आ गया नया साल
और मेरी कविता की उंगली पकड़ कर
खड़ा हो गया मालूम नहीं |
     4.
हमारे कस्बे में साल बदल गया है
पिता से ज्यादा माँ की फिक्र में बड़े होते बच्चे
आकाश में उडती पतंगों को देखकर
भूलने लगे हैं ‘होम वर्क’ |
घर की ज़रूरतों से जूझती
बूढ़ी हो रहीं हैं कई गृहिणियां
रात उतरने से पहले
स्ट्रीट लाइट में बैड मिंटन का मैदान हो रहीं हैं सड़कें
अब भी बुजुर्गों के चेहरे पर है एक निचाट खालीपन |
पंचांग वाले कैलेण्डर में लोग बेसब्री से ढूंढ रहे हैं
नये साल में अपना भविष्य
पार्क भर गए हैं आज्ञाकारी पतियों,
संतुष्ट पत्नियों और उत्साही बच्चों से
नशा चढ़ रहा है युवकों की आँखों में
युवतियों की मुस्कराहट में समय से पहले ही
उतर रहा है – वसंत |
आकाश में उड़ रहे हैं
बच्चों के हाथ से छूट गए कुछ गुब्बारे
धीरे- धीरे सबको पता चल रहा है
कि हमारे कस्बे में साल बदल गया है |
            
          ******