Thursday, January 17, 2013

सिर्फ चिंता नहीं, चिंतन भी जरूरी



                     
                         सिर्फ चिंता नहीं, चिंतन भी जरूरी

    दिल्ली में मेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने अपने समय, समाज और संस्कृति के साथ उसमे बसी लगभग आधी आबादी के वजूद पर ही एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है | 16 दिसंबर 2012 चलती बस में घटी इस घटना के बाद  से जारी युवा आन्दोलन 22 दिसंबर को अपने उफान पर आ गया, जब आन्दोलनकारियों ने विजय चौक,नार्थ-साउथ ब्लॉक तथा रायसीना हिल्स पर एक तरह से कब्ज़ा ही कर लिया | सरकार सकते में आगई | आन्दोलनकारियों को पुलिस ने भरसक दबाने की कोशिश की,पानी की बौछारें और अश्रुगैस छोड़ी गयी, लाठियां चटकाई गयीं,मगर अपनी मांग पर डटे  युवाओं ने दूसरे दिन फिर पुरजोर प्रदर्शन किया | उनकी मांग थी- बलात्कारियों को कडी से कड़ी सजा और महिलाओं की सम्पूर्ण सुरक्षा की गारंटी |
      दुष्कर्म पीडिता के साथी और उस घटना में बुरी तरह घायल अवनींद्र पाण्डेय ने लम्बी चिकित्सा के बाद होश में आने पर जो बयान दिया, वह हमारे तथाकथित मौजूदा शहरी समाज की जिस अमानवीय और निर्मम तटस्थता की ओर संकेत करता है वह भी कम स्तब्धकारी नहीं | शायद भारत के इतिहास में यह एक ऐसी घटना है, जिसने समाज के हरेक वर्ग को झकझोर कर रख दिया है, यह सोचकर आत्मग्लानि होती है कि हम सभी दुर्भाग्य से उसी समय का हिस्सा हैं,जिसमे आदमी बर्बरता की सारी सीमाएं पार कर एक नृशंस जानवर में बदल चुका है |
      इस घटना के विरोध में देशभर के युवा आंदोलित हैं और संसद से सड़क तक एक बहस छिड़ चुकी है | इस बहस के केंद्र में भले ही दुष्कर्म की उक्त लोमहर्षक घटना हो किन्तु इसका विस्तार वर्तमान समाज में महिलाओं की अस्मिता और पितृसत्तात्मक पुरुषवादी समाज के उस दमनात्मक रवैये तक जाता है, जो रुढिग्रस्त भारतीय मानस में सदियों से जड़ जमाये बैठा है | बदलते सामाजिक परिवेश और  आज़ादी के साढ़े छह दशक बाद भी भारतीय समाज में महिलाओं के प्रति पुरुष के दमनात्मक व्यवहार में कोई तब्दीली नहीं हुई यह तो स्पष्ट है | आज संसद के गलियारों से लेकर सड़क तक निर्बाध जारी इस बहस में राजनेताओं से लेकर बुद्धिजीवियों और आम आदमी तक और एक स्त्री- मजदूर से लेकर शिक्षिका तक अनायास ही जिस बहस का हिस्सा बन गए हैं, उसके दो पहलू स्पष्ट हैं – महिलाओं के प्रति पुरुषों के दमनकारी- प्रवृत्ति का विरोध दूसरे मौजूदा भारतीय समाज में पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में महिलाओं के रहन-सहन में आया खुलापन |
      यह बहस बहुत दूर तक जा सकती है | मगर यह भी तय है कि 21 वीं सदी के प्रारंभिक दशकों में आज  महिलाओं के प्रति 16 वीं सदी का नजरिया हमारी कुंठा ग्रस्त मानसिकता का ही परिचय देगा | वैश्वीकरण के इस दौर में क्या ग्रहणीय है और क्या वर्जनीय यह  भी गंभीर चिंतन की अपेक्षा रखता है | 

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