आज महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है | राष्ट्र पिता की पुण्य
स्मृति को मेरा शत शत नमन !
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी मात्र एक व्यक्ति या महापुरुष
नहीं थे | वे एक विचार और दर्शन थे | जीवन-जगत
में व्याप्त हिंसात्मक शक्तियों के विरुद्ध अहिंसात्मक क्रांति के अग्रदूत |
आज
ही के दिन गांधी एक जीवित कथा से इतिहास हो गए थे | काल के क्रूर हाथों ने उन्हें
हमसे आज ही के दिन छीना था | उस क्षण का ह्रदय विदारक चित्रण लुइ फिशर ने अपनी पुस्तक ‘गांधी की कहानी
‘ में किया है –“ शाम को साढे चार बजे आभा भोजन लेकर आई | यही उनका अंतिम भोजन
होनेवाला था | इस भोजन में बकरी का दूध, उबली हुई कच्ची भाजियां,नारंगियाँ,ग्वारपाठे
का रस मिला हुआ अदरक,नींबू और घी का काढ़ा –ये चीजें थीं | नई दिल्ली में बिड़ला भवन
के पिछबाड़ेवाले भाग में ज़मीन पर बैठे हुए गांधी जी खाते जाते थे और स्वतंत्र भारत
नयी सरकार के उप-प्रधान मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल से बातें करते जाते थे |
सरदार पटेल की पुत्री और उनकी सचिव मणि बहन भी वहां मौजूद थीं | पटेल और प्रधान
मंत्री नेहरु के बीच मतभेद की अफवाहें थीं| अन्य समस्याओं की तरह यह समस्या भी
महात्मा जी के पल्ले डाल डी गयीं थीं |
गांधी
जी,सरदार पटेल और मणि बहन के पास अकेली बैठी आभा बीच में बोलने में सकुचा रही थी |
परन्तु समय- पालन में गांधी जी का आग्रह वह जानती थी | इसलिए उसने महात्मा जी की
घडी उठा ली और उन्हें दिखाई | गांधी जी बोले –“ अब मुझे जाना होगा |” यह कहते हुए
वे उठे और फिर भवन के बाईं ओर बड़े पार्क में प्रार्थना स्थल की ओर चल पड़े| महात्मा
जी के चचेरे भाई के पोते कनु गांधी की पत्नी आभा और दूसरे चचेरे भाई की पोती मनु
उनके साथ चलीं | उनहोंने इनके कन्धों पर अपने बाजुओं का सहारा दिया | वह उन्हें
अपनी ‘टहलने की छड़ियाँ’ कहा करते थे |
प्रार्थना-स्थान के रास्ते में लाल पत्थर के खम्भों वाली लम्बी गैलरी थी|
इसमें से होकर प्रतिदिन दो मिनट का रास्ता पार करते हुए गांधी जी सुस्ताते और मजाक
करते थे ---------अब वह प्रार्थना-स्थान के पासवाली दूब पर चल रहे थे | नित्य की
सायंकालीन प्रार्थना के लिए करीब पांच सौ की भीड़ जमा थी |----------- ठीक उसी समय
तीन गोलियां चलीं | गांधी जी के मुंह से शब्द निकले --- “हे राम !” और एक युग का पटाक्षेप हो गया |”
महात्मा गांधी ने हमें सत्याग्रह का शस्त्र
और अहिंसा का आचरण- शास्त्र दिया | आध्यात्मिक नैतिकता की सहायता से उन्होंने
हमारी दुर्बलताओं को शक्ति और साहस में बदल दिया |उनका कहना था कि दुनिया में आज
भी इतने लोग जिंदा हैं, इसीसे सिद्ध होता है कि संसार की नींव शस्त्रबल पर नहीं है,
बल्कि सत्य,दया और आत्मबल पर है |

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