Monday, August 27, 2012

मन माने की बात


ज्ञानीजन    कह गए हैं – मन चंचल होता है | इसकी गति सबसे अधिक होती है | इसमें आवेग भी अधिक है | हम किसी एक स्थान पर बैठें हों और हमारा मन सुदूर की यात्रा पूरी कर क्षण भर में लौट सकता है| हिंदी में मन के पर्यायों में “ चित्त “ शब्द है | इसलिए “ चित्त से उतरना “ और “ चित्त पर चढ़ना “ दो महत्वपूर्ण मुहावरे हैं | जो चीज चित्त से उतर जाती है, पुनः उसे स्वीकार कर पाना मुश्किल होता है | कबीर की पंक्ति है – “ बड़ी मार कबीर की,/ जो चित से दिया उतार “
                  शरीर में मन की अवस्थिति कहाँ पर होती है ? विभिन्न प्रचलित ज्ञानधाराओं में एक विशेष ज्ञानधारा केवल मन पर केन्द्रित है, जिसे मन के विज्ञान [ मनोविज्ञान-Psychology ] के नाम से जाना जाता है | वहाँ मन के लिए शब्द है –Mind | मनोविज्ञान मन की अवस्थिति मस्तिष्क में मानता है |उसका तर्क है –मस्तिष्क का सक्रिय भाग ही मन है| इसलिए वहां चेतन और  अवचेतन  की अवधारणा है | भाववादी ज्ञानधारा के रूप में विकसित साहित्य मन को केवल मस्तिष्क का अंग नहीं मानता | उसका मानना है कि मन में बुद्धि और ह्रदय दोनों का संयोग है | मनोवैज्ञानिक ह्रदय में चेतना की स्थिति नहीं स्वीकारते | उनके लिए वह मात्र शरीर में रक्त संचार का कारक एक महत्वपूर्ण अंग भर है | मगर किसी भी घटना-दुर्घटना, हर्ष या विषाद की सूचना पर ह्रदय की धडकनों का तेज़ हो जाना या किसी भी आघात से अचानक ह्रदय गति का रुक जाना क्या बताता है ? शरीर विज्ञानी यह तर्क दे सकते हैं कि मस्तिष्क को प्राप्त किसी भी आघात  की सूचना संवेदनशील तंतुओं के माध्यम से ह्रदय तक पहुंचती है, जिससे रक्तसंचार प्रभावित होता है और ह्रदय की धड़कन पर इसका असर पड़ता है | लेकिन यह अनुभव की चीज है कि ऐसे अवसरों पर अगर आप लोगों के अनुभव सुनिए तो लोग बताएँगे कि उन्हें उस समय ऐसा महसूस हो रहा था जैसे उनका ह्रदय स्वतंत्र रूप में कार्य कर रहा था | खैर यह शोध का विषय है | मगर यह तय है कि मन सर्वाधिक महत्वपूर्ण होता है | यों तो सुखकारी स्थितियों कि दो कोटियाँ मानी  जा सकती हैं – तनोरम और मनोरम | कुछ स्थितियां शरीर की  सुख-सुविधा  की दृष्टि से सुखकारी होती हैं, वे तनोरम कही जा सकती हैं किन्तु यदि व्यक्ति का मन उन सुख सुविधाओं के बावजूद भी न रमे तो समझा जा सकता है कि वह उसके लिए बिल्कुल ही मनोरम नहीं |
                  व्यक्ति में जैसे –जैसे बुद्धि का विकास होता है वह मन पर नियंत्रण की  कला ही  सीखता है | सम्पूर्ण आचरण शास्त्र [ Ethics ] मन पर नियंत्रण  की कला का ही सिद्धांत रूप है | अनियंत्रित मन हज़ार तरह की अराजकताओं को जन्म देता है और नियंत्रित मन से व्यक्तित्व निखरता है |

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