Thursday, August 9, 2012

अ"भाव"

अ"भाव" का अर्थ है -भाव रहित होना |अर्थात भाव से शून्य होना,भाव से खाली होना | आज हर प्रकार के तनाव के मूल में मानव जाति में व्याप्त होता अभाव ही है | शब्दकोश कहता है -"भाव"का पर्याय "राग "या "प्रेम" भी है |मानवीय सृष्टि का कारक भाव ही है |मानव जाति का विकास भी भाव से ही हुआ है |इसी वृत्ति के कारण मनुष्य ने अन्य पशुओं से इतर अपनी पहचान बनाई |भाव के कारण उसमे सामूहिक जीवन जीने की इच्छा ने जन्म लिया और फिर परिवार तथा समाज बना ,जिसका व्यापक रूप आज राष्ट्र और विश्व के रूप में दिखाई देता है |
       हम भाव रहित होकर मानव जाति के मूल धर्म से हीन हो जाते हैं |हमारे भीतर  हमारी जातीय पहचान के रूप में अवस्थित यह भाव पारस्परिक साहचर्य का भी जनक है ,जो परिवार ,समाज फिर राष्ट्र के साथ जुड़कर "वसुधैव कुटुम्बकम "की भावना से हमें अनुस्यूत करता है |आज सारी दुनिया वैश्वीकरण की बात कर रही है |यह भले ही "बाज़ारवाद" के समानांतर विकसित शब्द हो ,जिसका आधार सर्वथा आर्थिक हो किन्तु सम्पूर्ण विश्व के एकीकरण की यह विश्व व्यापी चेष्टा एक व्यापक भाव का ही लक्ष्य लेकर चलती है |हम अभाव से ग्रस्त होंगे तो विश्वजनीन भाव की कल्पना असंभव है | हम भाव सम्पन्न बनें,भाव समृद्ध हों तभी इस तरह की कल्पना साकार हो सकेगी | समकालीन हिंदी कविता के लोकप्रिय वरिष्ठ कवि त्रिलोचन की काव्य पंक्तियाँ ऐसे अभावमय समय में हमारा मार्गदर्शन कर सकती हैं -
                                              "भाव उन्हीं का सबका जो थे अभावमय
                                               पर अभाव से दबे नहीं जागे स्वभावमय |"  

No comments:

Post a Comment