शास्त्र कहता है –विद्या विमुक्त करती है | विद्या का एक
अर्थ ज्ञान भी है | ज्ञान अज्ञानता का विरोधी है | अज्ञान अँधेरे का पर्याय है –
मन का अँधेरा,बुद्धि का अँधेरा,सोच का अँधेरा | अँधेरे में हमारी बुद्धि संकीर्ण
हो जाती है | रौशनी में फैलाव होता है, वह संकीर्णताओं को तोडती है | हमारी
अज्ञानता कई संकीर्णताओं को अनायास ही जन्म देती है | संकीर्णता और वर्जना में
चोली दामन का सम्बन्ध है |वह अविद्या की सहेली है | शास्त्र शिक्षा को भी विद्या
के पर्याय के रूप में ही रखते हैं | हम हमेशा तमस से ज्योति की ओर अग्रसर होने को
ही जीवन का लक्ष्य मानते रहे हैं | मृत्यु से अमृत की ओर अनवरत यात्रा के आकांक्षी
| शिक्षा सिखाती है,सीख देती है | ज्ञान पुस्तक से मिले,या शिक्षक{गुरु} से बुद्धि
पर पड़ा अँधेरे का आवरण हटाने का माध्यम है | चर्म चक्षु लेकर तो सभी इस धरती पर
जन्म लेते हैं, मगर गुरु हमारे भीतर मर्म चक्षु का विकास करता है | इसलिए सूक्ति
वाक्य है –“ नास्ति विद्या समम चक्षु “अर्थात विद्या के सामान दूसरी कोई आँख नहीं | तब तो विद्या
दृष्टि भी है और विमुक्ति का माध्यम भी | लोग कहते हैं, जब आँख खुले तभी सवेरा |
जो जितनी देर सोता है उसकी रात उतनी ही लम्बी होती है और उसकी सुबह उतनी ही देर से
| अज्ञानता की रात भी ऐसी ही होती है गुरु जब हमारी आँखे खोलता है तभी अज्ञानता
मिटती है | आज शिक्षा हमारे लिए
विमुक्ति का मार्ग नहीं, बल्कि संकीर्णताओं में आबद्ध करने का साधन बन गयी है |
खासतौर से उच्च शिक्षा जिस पर सम्पूर्ण देश का भविष्य टिका होता है,वह अपने
उद्देश्य से भटक गयी है | उच्च शिक्षा के तीन प्रमुख उद्देश्य हैं –विभिन्न
ज्ञानधाराओं का अध्ययन,समकालीन सन्दर्भों में उसकी व्याख्या तथा शोध और चिंतन –मनन
के द्वारा ज्ञान की नयी दिशाओं की तलाश | मगर इन सबके लिए जिस परिवेश की आवश्यकता
है उसका नितांत अभाव है | इसके साथ ही शिक्षा के इन तमाम अर्थ-आयामों के अर्जन
केलिए चेतना के विस्तार की भी बड़ी जरूरत है |मगर हम प्रारंभ से ही इसतरह के
वातावरण के निर्माण में लगे हैं,जिसमें चेतना का विस्तार कतई संभव नहीं,हम प्रारंभ
से ही बच्चों को मार्क्स पैदा करने का यन्त्र बना देते हैं ,जिस कारण उन्हें अपनी
संस्कृति और अपने परिवेश से जुड़ने का अवकाश नहीं मिलता,चेतना का विस्तार अपने
परिवेश में ही होता है,संस्कृति से ही वह संजीवनी ग्रहण करती है |
आज वैश्वीकरण और बाजारवाद के बढ़ते वर्चस्व के युग में उपभोक्तावादी संस्कृति
का विकास बड़ी तेजी से हुआ है | अब व्यक्ति और समाज के सम्बन्ध पर उत्पाद और
उपभोक्ता - सम्बन्ध का दबाव है | आज व्यक्ति या तो उत्पाद बेचनेवालों की जमात में
है या उपभोक्ता| आज दूसरे किसी सम्बन्ध का
कोई महत्वा नहीं है | इसी वातावरण की देन है तकनीकी शिक्षा का बढ़ता प्रसार |
आज तकनीकी शिक्षा का प्रसार बड़ी तेजी बढ़ रहा है |
व्यक्ति अब संसाधन में तब्दील हो चुका है | इसलिए शिक्षा मंत्रालय का नाम बदल कर
मानव संसाधन विकास मंत्रालय कर दिया गया
है | यह प्रक्रिया एक अच्छा मनुष्य बनाने की नहीं बल्कि एक यन्त्र बनाने की है,फिर
सहानुभूति,संवेदना,साहचर्य और चेतना के विस्तार की बात करना बेमानी है,जो
व्यक्तित्व निर्माण के लिए आवश्यक होता है | यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण भी है और
भयावह भविष्य का संकेतक भी |
हम तकनीकी शिक्षा
के साथ परम्परित शिक्षा को भी निरर्थक न होने दें | साहित्य, दर्शन, इतिहास, समाजशास्त्र तथा ललित
कला की विभिन्न विधागत शिक्षा चेतना के विस्तार को ही दिशा देने का उपक्रम है, जो
देश के हरेक विश्वविद्यालय में आज व्यवस्था और छात्रों की उदासीनता का दंश झेल रहे
हैं |
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