Thursday, August 23, 2012

समय:चार कविताएँ


      एक
   
      पता नहीं कब शायद बहुत पहले
      किसी बुजुर्ग ने देखा था
      इतिहास के पृष्ठों पर एक टूटा हुआ पंख
      तभी से मान लिया गया कि
      समय के पैर नहीं होते पंख होते हैं |
      किसी जुलूस के बहुत पीछे छूट गए
      बदहवास भागते आदमी की
      मुट्ठियों से फिसलते समय को
      बहुत लोगों ने देखा था एक साथ
      तभी सोचा गया कि
      थोड़ी-सी असावधानी से
      छूट सकता है समय |
      सदियों से समय का चेहरा
      खोज रहे हैं शोध प्रज्ञ,
      जारी हैं ज्ञानियों के प्रवचन
      समय के अस्तित्व के बारे में,
      बहुत ऊंचे टीले पर खड़ा
      एक आदमी मुस्कुरा रहा है लगातार
      कि पागल हो रही है दुनिया
      इतना शोर है,जिसके बारे में
      वह तो बरसों से पड़ा है उसकी जेब में |
    
      दो 
      नसीहत है कि
      समय को पहचानो
      नज़रअंदाज़ मत करो,
      सरकता हुआ निकल जाता है
      बगल से, फिर वर्षों मुंह चिढ़ाता है |
      मगर वे उधेड़बुन में हैं
      कि कौन-सी जुगत बिठाएं?
      कैसे पकड़ें समय को
      कहाँ-कहाँ मिल सकता है वह,
      किसे पता है उसका ठिकाना ?
     
      तीन  

      समय माँ के पास नहीं
      पिता के पास भी नहीं,
      हमजोलियों के पास है भी थोडा
      तो उससे ज्यादा है अंकुश
      यह सोच कर हमेशा उदास रहती है
      एक स्कूल जाती लड़की
      कि कब आएगा उसका अपना समय
      जब जरूरत नहीं पड़ेगी
      किसी से माँगने की |
    
      चार
     
      समय आ गया है
      हरे लिफाफे में मुहरबंद
      डाकिया मौसम है
      हवाएं टांक रहीं हैं धरती पर
      धूप के पैबंद
      यह पहाड़ों पर खड़े होकर
      ऊंची आवाज़ में गाने का समय है |
      नहीं यह समय नहीं
      दिनभर की कमाई और
      कर्जों के हिसाब जोड़ने का |
     
            *****



         
     
  
     
        

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