एक
धर्म-अधर्म,न्याय और अन्याय के
महासंग्राम के बाद की
विश्रांति में जीता एक नगर -कुरुक्षेत्र,
जैसे यहाँ की हरेक चीज में है एक लय,
धूप में खुलता है,मगर कभी अँधेरे में
डूबता नहीं है यह शहर |
युद्ध के बाद सब कुछ वहीँ पड़ा है यथावत
केवल लाशें उठा ले गए हैं गिद्ध
और क्षत-विक्षत राज मुकुटों के रत्न
बाँट लिए हैं सामंतों ने |
वहीँ पड़ा है ब्रह्म सरोवर
अर्जुन के बाण से निकली गंगा वहीँ पर रुकी है |
लगता नहीं कभी रक्त की नदी में स्नात हुआ होगा यह क्षेत्र और
सबके हिस्से वितृष्णा और वैराग्य छोड़ कर
यहीं से विदा हुए होंगे ब्रह्म ज्ञानी |
अगर सुनना चाहो तो अब भी सुनाई पड़ेगा -
श्री कृष्ण के पाञ्चजन्य का उद्घोष,
अर्जुन का पौण्ड्र,
अब भी दिखाई पड़ेंगे शिखंडी की फूहड़ हँसी के सामने
निस्तेज होते भीष्म |
दो
अहिंसा टांग दी गयी है -
संगीन पर किसी फटे वस्त्र की तरह
कितनी यंत्रणादायक है शर शय्या पर
सारी रात मृत्यु की प्रतीक्षा |
एकलव्य के कटे हुए अंगूठे और सुदर्शन चक्र से छिली हुई
कृष्ण की तर्जनी से धर्मार्थ निकले रक्त का रंग एक ही है |
मुझे नहीं पूछना इतिहास से
किसी अंधे युग की पराजय का कारण
और नहीं जानना कि आज
किस राष्ट्र नायक का चेहरा
कृष्ण से मिल रहा है
और कौन दुरभिसंधि में निष्णात है -शकुनि-सा
रक्त के समुद्र से धीरे -धीरे
आज़ाद हो रहा है सूर्य
और दुनिया के बीच चौराहे पर
बेसुध पड़ा है -इतिहास |
दसों दिशाओं में गूँज रही है -शंख ध्वनि
ईश्वर हमारी आत्मा में बल दें
कि हम अपलक शून्य की ओर देखते
इतिहास को समझा सकें
यंत्रणा की गहन रात्रि के बाद
जीवन की भोर का मतलब समझा सकें |
धर्म-अधर्म,न्याय और अन्याय के
महासंग्राम के बाद की
विश्रांति में जीता एक नगर -कुरुक्षेत्र,
जैसे यहाँ की हरेक चीज में है एक लय,
धूप में खुलता है,मगर कभी अँधेरे में
डूबता नहीं है यह शहर |
युद्ध के बाद सब कुछ वहीँ पड़ा है यथावत
केवल लाशें उठा ले गए हैं गिद्ध
और क्षत-विक्षत राज मुकुटों के रत्न
बाँट लिए हैं सामंतों ने |
वहीँ पड़ा है ब्रह्म सरोवर
अर्जुन के बाण से निकली गंगा वहीँ पर रुकी है |
लगता नहीं कभी रक्त की नदी में स्नात हुआ होगा यह क्षेत्र और
सबके हिस्से वितृष्णा और वैराग्य छोड़ कर
यहीं से विदा हुए होंगे ब्रह्म ज्ञानी |
अगर सुनना चाहो तो अब भी सुनाई पड़ेगा -
श्री कृष्ण के पाञ्चजन्य का उद्घोष,
अर्जुन का पौण्ड्र,
अब भी दिखाई पड़ेंगे शिखंडी की फूहड़ हँसी के सामने
निस्तेज होते भीष्म |
दो
अहिंसा टांग दी गयी है -
संगीन पर किसी फटे वस्त्र की तरह
कितनी यंत्रणादायक है शर शय्या पर
सारी रात मृत्यु की प्रतीक्षा |
एकलव्य के कटे हुए अंगूठे और सुदर्शन चक्र से छिली हुई
कृष्ण की तर्जनी से धर्मार्थ निकले रक्त का रंग एक ही है |
मुझे नहीं पूछना इतिहास से
किसी अंधे युग की पराजय का कारण
और नहीं जानना कि आज
किस राष्ट्र नायक का चेहरा
कृष्ण से मिल रहा है
और कौन दुरभिसंधि में निष्णात है -शकुनि-सा
रक्त के समुद्र से धीरे -धीरे
आज़ाद हो रहा है सूर्य
और दुनिया के बीच चौराहे पर
बेसुध पड़ा है -इतिहास |
दसों दिशाओं में गूँज रही है -शंख ध्वनि
ईश्वर हमारी आत्मा में बल दें
कि हम अपलक शून्य की ओर देखते
इतिहास को समझा सकें
यंत्रणा की गहन रात्रि के बाद
जीवन की भोर का मतलब समझा सकें |
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