Wednesday, August 15, 2012

आज़ादी का जश्न


अपने सभी पाठकों और मेरे “सान्निध्य” को सार्थक करनेवाले सभी मित्रों को भारत के स्वतंत्रता दिवस की 65 वीं वर्षगाँठ की हार्दिक शुभकामनाएँ ! 
     मित्रो, आज हम भारत की आज़ादी की 65वीं वर्षगाँठ मना रहे हैं,यह 66 वां स्वतंत्रता दिवस है | यह जश्न का दिन है | इस अवसर पर हर वर्ष चिन्तनों का दौर चलता है | फिर राष्ट्रगान के बाद तिरंगे के आगे संकल्प लिए जाते हैं | उसमे नये भारत के निर्माण का स्वर सबसे ऊँचा होता है,इसलिए उसकी अनुगूंज बहुत देर तक सुनाई पड़ती है | वैसे तो इस सबसे ऊँचे संकल्प की छाया लगभग सभी अभिभाषणों पर होती है |कहीं उसकी भूमिका में तो कहीं निष्कर्ष में अनिवार्यतः |यह भारत कौन सा है जिसके नवनिर्माण या पुनर्निर्माण की आवश्यकता है |शायद भारत का अतीत हर वर्ष एक और वर्ष की धूल की गर्त में चला जाता है ,अपने संकल्पों की फूँक मार कर हम जिसे साफ़ करना चाहते हैं | हम अतीत को जिंदा रखना चाहते हैं क्योंकि उसके साथ हमारा संस्कृति और संघर्ष का रिश्ता है |आज हमारे देश में एक साथ चार पीढियां मौजूद हैं |एक उन वृद्ध जनों की , जिनकी आँखों में अब भी स्वतंत्रता के लिए अथक संघर्षों की वह स्मृति जीवंत है |दूसरी वह जिसने उस अतीत को पढ़कर या सुनकर महसूस किया है |तीसरी वह जो उस संघर्ष के बारे में कुछ भी नहीं जानती |चौथी तो अभी इस अर्थ में अबोध है,उसे सिर्फ आज़ादी का जश्न दीखता है,उसे फहराता हुआ तिरंगा अच्छा लगता है,राष्ट्रगान अच्छा लगता है, मिठाइयाँ अच्छी लगती हैं और फिर दिनभर की छुट्टी अच्छी लगती है | पहली पीढ़ी के पास अनेक आशंकाएं हैं,दूसरी के पास हज़ार प्रश्न ,जिनमे उसकी जेहन में तैरता एक अहम् प्रश्न है, जिसे कभी कवि धूमिल ने शब्द दिए थे –
                    “आज़ादी क्या तीन थके हुए रंगों का नाम है,
                    जिन्हें एक पहिया ढोता है,
                    या कि इसका
                    कोई ख़ास मतलब होता है |”

सच है इसी खास मतलब की पहचान बाद की पीढ़ियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण है | आज भारत के पास सर्वाधिक युवाशक्ति है | इसलिए उसके संकल्प यदि मात्र राष्ट्रीय दिवस की औपचारिकता न रह जाएँ तो भारत पूरे विश्व में अपनी एक अलग पहचान कायम कर सकता है |

1 comment:

  1. युग के युवा मत देख दायें
    और बायें और पीछे
    झाँक मत बगले
    न अपनी आँख कर नीचे
    अगर कुछ देखना है देख आपने वृषभ कंधे
    जिन्हें देता निमंत्रण सामने तेरे पड़ा युग का जुआ

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